Tuesday, June 18, 2013

कुछ ऐसे बयां करूँ ...


कुछ ऐसे बयान करूँ इसे,
आते हुए तूफान की इंतज़ार में,


अकेले खड़ा,ताकता  इस रस्ते ,उस रस्ते, 
सोचता रहा ,क्या रखा इस बंजारेपन में |


आंधी आई ,तूफ़ान भी झेला ,
रात हुई ,बिन चांदनी ,

अमावस्या भी बदनाम हुई ,
सोचता रहा ,क्या रखा इस अकेलेपन में |

सिगरेट की कश में उडाता गया ,
जिंदगी जिसे कहते ,मासूम जिसे सहते ,

ठंडी हवा की झोकों और  ये शोर ,
सुनता रहा अकेले में,गाता रहा वीराने में |


नींद आई ,और सुबह भी हुई थी ,शायद ,
जग न सका ,फिर भी सुनता रहा सबकुछ ,

कुछ बाते अनकही ,कुछ अनसुनी ,
क्या रखा इसमें  ...कुछ बयां करूँ ऐसे ||


image :courtesy google images   : /

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